मेरी शायरी …

4. ठंढ़ बढ़ गयी है , सोचा ज़िस्म को पहरावों से ढ़क लेंगे ,

पर यहां तो रूह की तबीयत बिगड़ गयी …

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मेरी शायरी… 

2. उन्हें देखा हमने जब उस रात , तो ये सोचने लगा की ये मेहंदी की परछाई है , या चेहरा शर्म से सुर्ख लाल हुआ जा रहा था ||

यूं ही…..

आज ऑफिस में कुछ काम बचा था, प्रिया भी अपने मायके गई है तो घर में कोई wait करने वाला भी नहीं था इसलिए मैं ऑफिस में अकेला बैठा अपने काम निपटाने लगा | बैठे -बैठे  mouse पर हाथ फेर रहा था तभी Facebook का notification  आया , तुमने भी श्वेता को उसकी शादी पर बधाई दी थी , जो की हम दोनों की दोस्त है ! अनायास ही तुम्हारे नाम पर click कर दिया मैने और फिर यादों के कई धागे खुलते चले गए ! और अपने cubicle में बैठा मैं आंसुओं के सैलाब में डूबता-उतराता रहा ! 

कवि ! तुम आज भी वैसी ही हो , बिलकुल नहीं बदली | वही सामाजिक सरोकार वाले posts , सबको अपने उसी चिर-परिचित अंदाज में कविता – रूपी बधाईयाँ , बिलकुल अपने नाम को साकार करते हुए | उस post को भी देखा जिसमे तुमने मेरी पहली job पर , मेरी सफलता पर मुझे बधाई दी थी , एक कविता के रूप में ही तुमने अपना दिल खोल के रख दिया था , हमारे सुखद भविष्य की कल्पना भी कर ली थी तुमने ! और मैं उस दिन से तुम्हें प्यार से ‘पगली’ बुलाने लगा | सच ! तुम कितनी devoted थी हमारे relationship में ! हम साथ थे , हम खुश थे , हमारे बीच प्यार भी था !  पर मेरी एक गलती ने सब बदल दिया , मैं शायद अंदाजा भी नहीं लगा सकता तुम्हें कितनी तकलीफ हुई होगी | 

प्रिया एक बहुत अच्छी पत्नी है , उसने मेरा जीवन संवार दिया | पर अब भी दिल के किसी कोने में तुम्हारा प्यार जिन्दा  है  पर उससे ज्यादा है guilt ! तुम शादी क्यूं नहीं कर रही ? तुम्हारे अकेलेपन से मुझे guilt  होता है कवि ! प्लीज कोई साथी ढूंढ लो !

(मेरी कहानी – ‘कविता’ का एक अंश )

नया घोंसला

हम दोनों घर के’फर्निचर सेटअप’ को ले के लड़ रहे थे….तभी अचानक चिड़ीयों की चहचहाहट से नींद खुल गई ! खिड़की से बाहर झांक के देखा तो गौरेये का जोड़ा आम के पेड़ पर नया घोंसला बना रहा था, और वो चहचहाहट नहीं लड़ाई थी शायद घर के ‘सेटअप’ को लेकर ! पर वो उनकी हक़ीकत हैं और मेरा सपना…:)

(मेरी कहानी – ‘कविता’ का एक अंश)

हम्म….!!!!

‘हम्म’ – एक ऐसा शब्द है जिसकी परिभाषा कोई नहीं जानता… इसकी बानगी ही यहीं है ना बोलने वाला जानता है की उसने ऐसा क्यूं बोला, ना सुनने वाला समझ पाता हैं !
ये हम्म इनकार भी हो सकता है और इक़रार भी…. मेरी खुद की आदत बन गई है कि जब कुछ समझ ना आए तो ‘हम्म’ बोल दो…पर ‘बी केयरफुल’ जनाब , सामने वाला उसका क्या मतलब निकालेगा आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते…
आज की ही बात है…पड़ोस वाली आंटी के यहाँ गई थी , त्योहारों में कही भी जाओ मुहँ मीठा जरूर कराते है लोग,  ये सोचकर मिठाई को मना कर दिया मैने | पर आंटी के दोबारा ‘इंसिस्ट’  करने पर और ये बताने पर की मीठे में काजू बरफी है मेरा मन भगवान  इन्द्र के सिंहासन के समान डोल गया …और आंटी के पुछने पर मैने ‘हम्म’ बोल दिया | पर धत्त ! ऐसी ‘मॉडेस्टी’ की ऐसी की तैसी , आंटी उसे हमारा इनकार समझ बैठी | अब कोई उन्हे ये तो बताए कोई लाख बेसन के लड्डू  खा  के आए पर काजू बरफी को ना कैसे कह सकता है ! आप सब  ऐसी ‘मॉडेस्टी’ मत दिखाना 🙂

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